Saturday, March 18, 2017

पत्र: ११ १८ मार्च २०१७)

पत्र: ११ (१८ मार्च २०१७)

देश में मोदी प्रदेश में योगी 


पत्र श्रृंखला के आज के अंक में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को पत्र,


अभी कल ही मैंने एक पत्र लिखा था, जो की यौन उत्पीड़न पर एक खुला पत्र था। आज मैं उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के नाम एक पत्र लिख रहा हूँ। योगी जी आपको प्रणाम एवं आपको बहुत बहुत बधाई!

ये जीत विकास के नाम पर या यूँ कहें कि मोदी जी के नाम पर मिली है, मैं अपना मताधिकार का प्रयोग नही करना चाहता था परन्तु मैंने संविधान द्वारा दिए गए इस अधिकार का प्रयोग किया। ये लहर २०१४ जैसी मोदी जी की लहर थी जो प्रतिनिधि को दरकिनार कर लोगो ने मत दिए।

मैंने गोरखपुर में अपने जीवन के आठ साल गुजारे है, अपने शिक्षा के अहम् आठ साल। ख़ुशी होती है कि एक ऐसे पवित्र शहर से जुड़ा हुआ हूँ, जिसमे सभी धर्म के लोग धार्मिक-सद्भाव से रहते है। आज क्योंकि आप प्रदेश के मुख्यमंत्री बन रहे है, इसलिए हम पूर्वांचलियों के लिए बहुत सारे सपने सच होंगे ऐसा प्रतीत हो रहा है। पूर्वांचल के विकास में जो काम माननीय वीर बहादुर सिंह जी ने किया था, उसे अब जाकर गति मिलेगा वरना भूतपूर्व मुख्यमंत्री गण केवल चुनावी प्रक्रिया के लिए पूर्वांचल का दर्शन करते थे, विकास के लिए नही।

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१९९८ से आप गोरखपुर से सांसद रहे है और गोरखपुर के लिए कई अभूतपूर्व विकास कार्य करवाये, और आशा है कि अब बाबा गोरखनाथ की कर्मभूमि गोरखपुर में तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा। कुछ कार्य का यहाँ जिक्र करना चाहूँगा, जो जनता के बीच चर्चित है:-

  • गोरखनाथ अस्पताल का स्थापना
  • मेडिकल कॉलेज का मान्यता यथावत रखना
  • जापान इंसेफेलाइटिस के लिए मेडिकल कॉलेज में अलग से वार्ड की स्थापना
  • गैस सिलिंडर भरने के लिए संयंत्र का स्थापना
  • एम्स की स्थापना
  • खाद कारखाना का पुर्नजन्म

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अब मैं चाहूँगा कि आप पूर्वांचल की आर्थिक दशा को और मजबूत करें जिससे कि यहाँ से मजदूर और पेशेवर/इंजीनियर इत्यादि का पलायन रुके और यहाँ का विकास हो।

  • वीडा और गीडा में उद्योगों की स्थापना, 
  • गोरखपुर में आईटी पार्क, 
  • कुशीनगर में विश्स्तरीय एयरपोर्ट की अविलम्ब शुरुआत, 
  • चीनी मिलों का पुर्नउद्धार, 
  • बाढ़ से बचने के लिए क्षेत्र में नदियों, नहरों और बाँधो की मरम्मत, 
  • क्षेत्र में कोल्ड स्टोरेज स्थापना,
  • गोरखपुर के दोनों विश्वविद्यालयों को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा,
  • गोरखपुर से शहरीय/अंतर्राज्यीय परिवहन की दुरुस्त व्यवस्था
  • गोरखपुर में जंक्शन के अलावा एक और विश्वस्तरीय रेलवे स्टेशन,
  • चौरी-चौरा शहीद स्मारक को एक पर्यटक स्थल के रूप में विकास,
  • राज्य में स्थित धार्मिक स्थलों तक यातायात की दुरुस्त व्यवस्था,
जो विकास आजादी के ७० सालों में नही हुए वो आने वाले कुछ सालों में प्रशस्त हो, इन्ही शब्दो के साथ आपके आशीर्वाद के लिए शुभेक्क्षु, राजेश्वर। 


शेष फिर,
पत्र: ११  
राजेश्वर सिंह
नई दिल्ली, भारत
#rajeshwarsh

Friday, March 17, 2017

पत्र: १० (१७ मार्च २०१७)

पत्र: १० (१७ मार्च २०१७)

ये पत्र सभी के लिए है,


पिछले कुछ दिनों से एक समाचार चर्चा में है, कि एक संस्था का मुख्य कार्यकारी अधिकारी अपने कनिष्ठ कर्मचारियों से अश्लील टिप्पणी और छेड़खानी करता है। इस पत्र के लिखने का मुख्य मकसद ये है कि लोग उन दो पहलुओं की तरफ भी देखे जबकि लोग केवल एक पहलू से जुड़े हुए है।

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भँवरी देवी बलात्कार कांड ने इस देश के संविधान में महिला यौन उत्पीड़न करने पर एक कठोर सजा का प्रावधान कराया। राजस्थान की राजधानी जयपुर से पचास किलोमीटर दूर ग्रामीण आँचल में अनपढ़ और पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखने वाली भँवरी का बलात्कार उसके गाँव के ही उच्च जाति के पाँच लोगो ने किया था। आज पचपन साल की हो चुकी भँवरी देवी साथ घिनौना कृत्य हुए लगभग २५ साल हो चुके है। परन्तु आज तक इस मामले में जयपुर उच्च न्यायालय में केवल एक बार सुनवाई हुई है और कथित पांच आरोपियों में से दो की मौत भी हो चुकी है।

आप इस अदालती मामले के बारे में बीबीसी पर जरूर पढ़िए जिसमे निचली अदालत के द्वारा दिए गए बेतुके और बेबुनियाद कारण एक महिला को हतोत्साहित करते है।

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आज से छः साल पहले एक और भँवरी कांड हुआ था वो भी राजस्थान में ही हुआ था। जिसमे आशा (नर्स/ए एन एम्) भँवरी देवी प्रदेश के कई राजनीतिक नेताओ को अपने मोहपाश में फसाकर, आपत्तिजनक अवस्था में सीडी बना ली थी और उनको करोड़ो के लिए ब्लैकमेल कर रही थी। आख़िरकार उसकी हत्या कर दी गई और सीबीआई इस मामले की जाँच कर रही है।

चर्चा में चल रहे यौन उत्पीड़न की बात करूँ तो इस मामले में दो नही तीन पहलू बनते है, पहला वो सीईओ सही में बेहूदा हरकते करता है, दूसरा एक देश के टॉप टेन स्टार्टअप में से एक होने के कारण वहाँ आपको काम ना मिल रहा हो और तीसरा कि कहीं वो कंपनी खुद अपने प्रचार के लिए ऐसे बेहूदे हथकंडे अपना रही हो।

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पहले पहलु पर चर्चा करूँ तो यहाँ ये बताना बेहतर होगा कि मर्द जाति में कुछ ऐसे होते है जो नारी जाति को देखकर लार टपकाने लगते है। अपने बल, हठ, धन इत्यादि के दम पर एक नारी को भोगविलास की वस्तु समझते है और ऐसे कुकर्म करने का प्रयत्न करते हैं। भँवरी देवी के साथ साथ आपको ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जो ऐसे पहलुओं की एक बानगी पेश करते है जैसे साढ़े चार साल पहले हुआ निर्भया कांड, डेढ़ साल पहले गुरुग्राम के एक संस्था में एक शोध छात्रा के साथ देश के नामी गिरामी निदेशक का उत्पीड़न, विशेष पंथ के एक धर्म गुरु के कृत्य, कुछ महीने पहले उत्तर प्रदेश के सड़क पर हुआ सामूहिक दुष्कर्म, या कुछ दिनों पहले हुआ कुकर्म जिसमे उत्तर प्रदेश के एक पूर्व मंत्री की गिरफ़्तारी हुई। ऐसे मामले मीडिया में बहुत चर्चित होते हैं परन्तु इस कलयुग में किसी पर आरोप सिद्ध कर पाना बहुत मुश्किल है, कुछ मामलों में ही सजा मुकर्रर हो पाती है जैसे आज से तेरह साल पहले धनंजय चटर्जी को फाँसी दी गई अठारह साल की लड़की के साथ बलात्कार और हत्या के जुर्म में, वो भी कुकर्म करने के चौदह साल बाद। ऐसे में कइयों को लगता है कि इस देश में कुछ भी कर लो, कानून कुछ नही करेगा, टरकाने के सिवा।

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अब बात करता हूँ दूसरे पहलू की, जहाँ दफ़्तर में काम कर रहे मर्द और औरत के बीच मर्ज़ी (सहमति) से बना हर संबंध, चाहे वो दोस्ताना हो या फिर 'सेक्शुअल', वो उत्पीड़न नहीं है। सहमति से किया मज़ाक, तारीफ़ या उसमें इस्तेमाल की गई 'सेक्शुअल' भाषा में कोई परेशानी नहीं है। किसी से कस कर हाथ मिलाना, कंधे पर हाथ रख देना, बधाई देते हुए गले लगाना, दफ़्तर के बाहर चाय-कॉफ़ी या शराब पीना, ये सब अगर सहमति से हो तो इसमें ग़लत कुछ भी नहीं है। परन्तु यही आपसी सहमति जब फायदेमंद नही होती तो अपने फायदे और दूसरे के नुकसान के लिए आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल पड़ता है वैसे आरोप-प्रत्यारोप से पहले मामले को रफा-दफ़ा करने के लिये नेगोशिएशन्स होते है। इस मामले में अधिकतर पुरुष जाति प्रताड़ित होती है। इस प्रताड़ना से शायद ही कोई उबर पाता है।

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तीसरा पहलू की बात करें तो कई कंपनिया अपने किसी प्रोडक्ट के प्रचार के लिए ऐसे उल-फजूल के खबरें निकालते है। और अगर उसी ढर्रे पर ये भी कंपनी चल रही है तो ऐसा इसलिए क्योंकि इनके कई कंपटीटर मार्केट में आ गए है, और वो भी बेहतर मनोरंजन करा रहे है। 

अब इस मामले के पीछे क्या सच्चाई है, वो तो आने वाला वक्त बतायेगा। 

इस पत्र को लिखने का खास मकसद यही है कि आप हर एक पहलू को देखकर किसी के बारे में कोई विचार बनाए, क्योंकि ये कलयुग है। यहाँ सबको ज्ञान देने वाले खुद अज्ञानी होते है और एक फ़कीर बहुत कुछ बता जाता है।

इस पत्र पर अपने टिप्पणी (कमेंट) जरूर दीजिये और एन्जॉय कीजिए शॉपिंग इस ब्लॉग से करके,

शेष फिर,
पत्र: १० 
राजेश्वर सिंह
नई दिल्ली, भारत
#rajeshwarsh

Sunday, March 5, 2017

पत्र: ९ (५ मार्च २०१७)

पत्र: ९ (५ मार्च २०१७)

पत्र श्रृंखला के आज के अंक में एक प्रेमी का पत्र एक भूतपूर्व प्रेमिका को जिसकी शादी कई साल पहले हो गई,

डिअर एक्स,
आशा है सकुशल होगी और अपने पति के साथ मौज कर रही होगी। इस पत्र को लिखने के पीछे का उद्देश्य सिर्फ यही है कि मैं तुमसे वो सब कह जाऊं जो पिछले कुछ दिनों से महसूस कर रहा हूँ। तुम ये जरुर सोच रही होगी कि आखिर इतने सालों बाद क्या जरूरत पड़ी, जो तुम्हे पत्र लिख रहा हूँ। जो इंसान तुम्हे शादी की बधाई ना दिया, तुमसे बात करना छोड़ दिया, आज पत्र क्यों लिख रहा है।

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कल मेरी शादी है अभी रात के दो बज रहे है कुछ ही पलों में सुबह हो जायेगी और समारोह के विभिन्न अनुक्रमों में व्यस्त हो जाऊँगा। मैं ये पत्र व्हाट्सएप्प पर लिख रहा हूँ, जानती हो क्यों? क्योंकि जबसे मेरी शादी फिक्स हुई है हमेशा मेरे दोस्त तुम्हारी याद दिला रहे है और मैं चाहता हूँ की शादी के बंधन में जुड़ने से पहले मैं अपने अन्दर की बातों को तुमसे साझा कर दूँ। तुमको शायद नहीं पता पर तुम्हारे लिए मैंने अपने कई करीबियों के दिल को चाहे-अनचाहे दुःख पहुचाया है। तुमसे मिलने के लिए मैं छात्रसंघ चौराहे पर अपने दोस्त को मोटरसाइकिल से उतार देता था, क्योंकि वहाँ से तुम साथ आती थी और बेचारा दोस्त वहाँ से मोहल्ले तक पैदल जाता था।

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तुम्हारे जिद करने पर डोसा खाने के लिए जब चौधरी रेस्तरा जाते थे तो डोसा के साथ साथ तुम्हारी मंचूरियन और फ्राइड राइस की चाह हो जाती थी। इस चक्कर में बजट ढीला हो जाता था, अन्दर ही अन्दर परेशान हो जाता था, तुम्हे कैसे पता होगा, तुम तो खाने और खिलाने में व्यस्त होती थी। तुम्हे पता है? कईयों बार मैं पेसाब करने के बहाने बाथरूम जाता था पर वो पेसाब करने नही बल्कि बिल पेमेंट करने के लिए या तो दोस्त को फ़ोन करने जाता था या फिर पैसे लेने (जो वो दस किलोमीटर आकर देते थे)।

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तुम्हे तो याद नही होगा पर मुझे आज वो दिन अच्छी तरह याद है जब यूनिवर्सिटी में तुम्हारा प्रोग्राम था और उसके लिए मैं दुसरे शहर से आया था जबकि मुझे उस सभागार में प्रवेश ही नहीं मिला था क्योंकि मैं युनिवर्सिटी से नही था? याद आया? थोड़ा सोचो शायद याद आ जाए। 
कई सारी यादें है तुम्हारे साथ के, जो मिटे नही। वैसे मैंने कोई खास कोशिश भी नही किया कि उन यादों को मिटा दूँ। 
एक चीज तो तुम्हे बताना भूल ही गया, जो मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण है। वैसे भी तुम्हे तो पता ही होगी और इसे बताते हुए मुझे हँसी भी आ रही है, आज वो बात सच हो रहा है जो मैं तुमसे अक्सर कहा करता था कि मेरी शादी अगर तुमसे नही हुई तो तुम्हारी सहेली से होगी और ये बात आज सच हो रहा है। ये एक अरैंजड मैरिज है और ये बात भी मेरी दीदी ने मुझे कुछ दिन पहले बताया। वैसे भी तुम्हारी सहेली तुमसे तो समझदार है, जानती हो क्यों? क्योंकि वो हर उस चीज़ का ख्याल रखती है जिसके लिए मैं कभी सोचता था कि तुम ख्याल रखो। 

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तुम मेराबर्थडे तक नही विश करती थी, और तुम्हारी सहेली ने मुझे गिफ्ट दिया, क्या दिया है, जानना चाहती हो? वही जो तुमसे कभी जिक्र किया था, मेरा खैर अब तुमसे क्या! तुम अपने में खुश रहो और मैं भी खुश रह लूँ। दो तीन दिन पहले तुम्हारी सहेली ने बताया कि तुम शादी में शायद आ रही हो, इसलिए मैंने सोचा कि कुछ तो लिखूँ तुम्हारे बारे में जो तुम पढ़ लो जिन्हें मैं सामने जगजाहिर ना कर पाऊं, और ये सलाह तुम्हारी सहेली ने ही दिया है कि एक पत्र लिखकर अपने बातें साफ़ साफ़ रख दो, इसलिए मुझे कोई डर भी नही। 
तुम्हे शादी की काफी देर बाद शुभकामनाए!

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तुम्हारे सहेली के आने से,
मेरी आने वाली जिन्दगी दिलचस्प होगी। 
आज जज्बातों पर साथ दी, 
कल कई और सपनो में साथ होगी ॥ 

तुम्हारे सहेली का आर!



पर्सनल नोट: इस पत्र को मुझसे (राजेश्वर) से जोड़कर ना पढ़े, इस पत्र की कहानी सत्य है परन्तु नाम, जगह और तिथियाँ बदल दी गई है। इसे पढ़े और अपने मित्रो के साथ शेयर करें।
और जब भी मेरी कृतियाँ पढनी हो या ऑनलाइन शॉपिंग करें, गूगल पर RAJESHWARSH सर्च करके मेरे ब्लॉग पर जरुर आए। 
धन्यवाद! 


Friday, March 3, 2017

पत्र: ८ (३ मार्च २०१७)

पत्र: ८ (३ मार्च २०१७)

पत्र कल होने वाले मतदान में मत देने वाले मतदाताओं को,

प्रिय मतदाताओं,
नमस्कार!
आशा अनुरूप आप लोग भी हमारे जैसे एक बेहतर समाज के लिए मतदान करेंगे या करने को सोच रहे होंगे और कहीं ना कहीं एक आस लगाए होंगे कि आगामी चुना हुआ प्रतिनिधि आने वाले पाँच सालो में देश/प्रदेश निर्माण के लिए बेहतर काम करें।

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इस समय मैं भी अपने निवास स्थान पर हूँ, जहाँ से मैं एक मतदाता के तौर पर पंजीकृत हूँ। इस चुनावी गर्मी में, कुछ राजनीतिक और गैर राजनीतिक व्यक्तित्व से कुछ चुनावी पहलुओं पर परिचर्चा हुई। इन्ही कुछ परिचर्चाओं में लोगो के अंदर राज्य सरकार से फैली निराशावाद और केंद्र सरकार के आशावादी विचारधारा ने लोगो को भाजपा के तरफ मोड़ा है। माहौल की बात करें तो केंद्र सरकार के नोटबंदी फैसले ने कहीं ना कहीं लोगो के मन में एक सकारात्मक विचार पैदा कर दिया है। मतदाता २०१४-लोकसभा चुनाव के जैसे मोदी के नाम पर मतदान करने जा रहे या फिर जाएँगे।

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परन्तु कहीं ना कहीं प्रदेश राजनीति से जुड़ा हुआ भाजपा प्रतिनिधित्व कमजोर नजर आ रहा है। प्रदेश में भाजपा प्रत्याशियों का गलत चुनाव, दल-बदलुओ को प्राथमिकता कहीं ना कहीं मतदाताओं और कार्यकर्ताओं को निराश कर रहा है। 
अगर मैं अपने विधानसभा क्षेत्र की बात करूँ तो वर्तमान विधायक १०वीं पास है जिन्हें MLA का abbreviation नही पता है, राष्ट्र गान और राष्ट्र गीत के बारे में नही पता है, फिर भी नाम के आगे डॉ लिखते है। किस विषय वस्तु अथवा रोग पर डॉक्टरी किये है, राम जाने। इस बार भी वो सपा दल से प्रत्याशी है।

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अब बात करूँ भाजपा की तो भाजपा से समर्थन प्राप्त दल ने ऐसे व्यक्ति को प्रत्याशी बनाया है जो २०१२ विधानसभा चुनाव में कांग्रेस दल का प्रत्याशी था, इस कारण हमारे जैसे कई मतदाता ऐसे स्थिति में है जहाँ आगे कुआँ और पीछे खाई है।
अंत में इतना ही कि NOTA (नन ऑफ़ द एबभ) प्रचलन में नही है।
मतदान करूँगा पर किसे, पता नही? आप भी मतदान करना, क्योंकि ये हमारा संवैधानिक हक़ है।

शेष फिर.....
पत्र: ८
राजेश्वर सिंह
कुशीनगर, भारत
#rajeshwarsh

Wednesday, February 22, 2017

पत्र: ७ (२२ फरवरी २०१७)


पत्र: ७ (२२ फरवरी २०१७) 

पत्र माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को


माननीय प्रधानमंत्री जी, 
सादर प्रणाम! 

आशा है आप सकुशल होंगे और कई सारे समस्याओं से जूझ रहे अपने देश भारत को तरक्की के राह पर प्रशस्त करने की कोशिश रहे होंगे। इस पत्र के माध्यम से मैं एक ऐसे मामले को आपके संज्ञान में लाने की कोशिश कर रहा हूँ जिससे, मेरे जैसे इस देश के दूर-दराज इलाकों (ग्रामीण परिवेश) में रहने वाले आम नागरिक हर दिन दो चार हो रहे होंगे। 

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पिछले साल के ८ नवम्बर को आपने राष्ट्र के नाम सन्देश में रूपये ५०० और रूपये १००० के नोटों को आधिकारिक तौर पर गैरकानूनी घोषित कर दिया। इस विमुद्रीकरण के कारण देश को एक साफ़-सुथरी और नया विचार मिला, जो समाज में फैले कुरीतियों को मिटाने में कई रूप से सहायक है और आने वाले दिनों में होगा। माननीय राजाराम मोहन राय द्वारा १८६२ ईसवी में सती-प्रथा उन्मूलन के लिए बनवाये गए कानून से अब समाज में उस समय फैली सती-प्रथा जैसी कुरीति से समाज को छुटकारा मिल चुका है। 

कुछ दिनों पहले मैं एक पेट्रोल पंप पर मोटर-साइकिल में पेट्रोल डलवाने गया, वहाँ पेट्रोल भरने वाले व्यक्ति से मैंने पूछा, “POS मशीन है?” 
“मतलब”, पेट्रोल पंप पर तेल भर रहा व्यक्ति बोला। 
“मतलब, एटीएम कार्ड से पेमेंट हो जाएगा?”, फिर मैंने पूछा। 
“नही है”, उसने बोला। 
“नेटबैंकिंग, भीम एप्प, मोबी क्विक, पेटीएम्”, मैंने फिर पूछा। 
“कुछ नही है भैया”, उसने बोला। 
“कब तक लगेगा?”, मैंने पूछा। 
“कभी नही”, उसने बोला। 
“ऐसा क्यों, सरकार तो बोल रही है कैशलेस होने को, फिर आप क्यों नही इसका फ़ायदा उठा रहे”, मैंने कहा। 
“जो भी हो, मालिक (पेट्रोल पंप) बोल रहे है कि नही लगेगा कोई ऐसा सिस्टम”, उसने बोला। 

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फिर मैंने जेब में बचे १०० रूपये का पेट्रोल डलवाया और निकल लिया। इस घटना को हुए लगभग ६५ दिन हो चुके है फिर भी आज तक इन पेट्रोल पंप पर POS मशीन नही लगी है। 

मैंने एक स्टार्टअप कम्पनी शुरू की है, जो सोलर एनर्जी सेक्टर में काम करती है और कुछ दिन पहले इसी व्यवसाय के सिलसिले अपने पैतृक गाँव फिर आया। इस बार मुझे लगभग हर रोज पेट्रोल डलवाना होता है, परन्तु इस क्षेत्र के सभी पेट्रोल पंप पर POS मशीन के बारे में पूछने पर सब इसके बारे में मना करते है और सबका एक ही उत्तर होता है, “नही लगेगा” । 

अब मैं बैंक जाकर पैसा निकालूं कि गाड़ी में पेट्रोल भरवा सकूँ, आखिर कब तक ऐसा रहेगा? जबकि ग्रामीण इलाकों के बैंको में अभी भी मुद्रा (कैश) की दिक्कत है, कैश निकालने में अभी भी परेशानी हो रही है । 

ग्रामीण परिवेश ऐसे सुविधाओं से कब तक विमुक्त रहेगा? कैशलेस व्यवस्था का हम सभी स्वागत करते है परन्तु कुछ लोगो के वजह से ये सुविधा एक दुविधा लग रही है । 

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मैं इस पत्र को लिखने से पहले कई ट्वीट करके सम्बंधित पेट्रोलियम कंपनी और पेट्रोलियम मंत्री माननीय धर्मेन्द्र प्रधान जी को अवगत करा चुका हूँ, परन्तु इस मामले में अभी तक कोई अनुरूप फल देखने को नही मिला है। मेरा ट्वीटर हैंडल है rajeshwarsh. 

इस पत्र को अपने ब्लॉग पोस्ट के साथ साथ मैं आपके प्रत्येक महीने के रेडियो कार्यक्रम “मन की बात” के लिए भी प्रेषित कर रहा हूँ। मुझे ख़ुशी होगी, अगर इस पत्र को आप अपने रेडियो कार्यक्रम में सम्मिलित करें और भारतीय जनता के साथ साथ धनाढ्य को कैशलेस होने के लिए प्रेरित करें। 

शेष फिर....... 

पत्र: ७ 
राजेश्वर सिंह (#rajeshwarsh) 
कुशीनगर, भारत

Sunday, February 19, 2017

पत्र: ६ (१९ फरवरी २०१७)

पत्र: ६ (१९ फरवरी २०१७)

पत्र चुनावी दंगल के उम्मीदवारों और उनके स्टार प्रचारको को, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से चुनावी दंगल में सम्मिलित है।


माननीय नेताओ और नेत्रियों,
सादर नमस्कार,

आशा है आप जहाँ भी होंगे सकुशल होंगे और प्रजातंत्र में राजतंत्र जैसे सुख-सुविधाओं का जबरदस्त उपभोग कर रहें होंगे। इस पत्र को लिखते वक्त देश के बड़े जनसँख्या वाले राज्य में विधानसभा चुनाव चल रहा है और सभी दल विरोधी दलों की बखिया उधेड़ने में लगे हुए है। इन्ही अधोलिखित चुनाव प्रचार में भाषणों, कथनों, कृत्यों, कारनामों, साक्ष्यो इत्यादि को ध्यान में रखते हुए इसे लिख रहा हूँ, आशा है ये पत्र आपके दिलोदिमाग़ पर कुछ प्रभाव डाले और आप आने वाले दिनों मे देशहित में ज्यादा सोचे।

आजकल के डिजिटल युग में सब नेता लोग एक दूसरे से अच्छा दिखने के होड़ में लगे हुए है। किसी दल का काम बोलता है तो कोई परिवर्तन चाहता है। किसी दल को जाति-धर्म के आधार पर वोट चाहिए कि आलिशान मकान बनवा लें तो किसी के लिए परिवार में ही नेताओं की लंबी फ़ेहरिश्त चाहिए। ये लोग शायद घर पर भी नेतागिरी करना चाहते है या फिर इनको विधानसभा-संसद में पारिवारिक माहौल चाहिए।

काम बोलने से याद आया, अगर काम ही बोलता है तो गठबंधन क्यों? इसी गठबंधन का एक दल तो ऐसा है जो गठबंधन के दूसरे दल के ख़िलाफ़ कुछ दिनों पहले लोगो के बीच जा-जाकर खटिया बिछा कर विरोध कर रहा था, पर जब खटिया ही लूट ली गई तो मरता क्या ना करता, कैरियर पर बैठ लिए। वैसे भी इस दल के युवा(केवल कहने के लिए युवा) नेता जो उम्र के मामले में तो अर्धशतक लगाने वाले है, परन्तु अभी तक इनसे कभी आधिकारिक तौर पर खटिया चरमराने-टूटने का खबर नही मिला है।

वैसे तो चुनाव आयोग ने कमर कस कर रखी है, नियमो के अनुसार पालन कराने के लिए फिर भी भारतीय हमेशा जुगाड़ निकाल ही लेते है। कुछ उम्मीदवारों ने तो अपने ही खिलाफ एक या एक से अधिक उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे है जिससे कि तथाकथित उम्मीदवार को चुनाव प्रचार के लिए कई वाहनों, प्रचारको का इंतेजाम हो सके। इसकी आधिकारिक तौर पर पुष्टि शायद ही कोई कर सके, परन्तु इस चुनाव दंगल में ये सब हो रहा है।

वैसे तो आप लोगो के कारनामे भी पढ़कर परमानन्द की अनुभूति होती है। ये तो चुनावी दंगल है, और जनप्रतिनिधि बनने के लिए आप लोगो में से अधिकतर ने अपने जीवनकाल में ऐसे ऐसे कृत्य किये होंगे जिसे सामाजिक और क़ानूनी तौर पर वैध नही माना जाता फिर भी आप लोग महान है। आपके लिए सब कुछ छूट है, चाहे जोर जबरदस्ती करे, बलात्कार करे, क़त्ल करे या अतिक्रमण करे, आदि आदि कृत्य अनादि काल से आप लोगो के लिए जायज है। 

आप लोग अपने इलाके में एक अलग ही सरकार चलाने लगते हो, वो चाहे लोगो से वसूली करनी हो या फिर चौराहों पर वसूली, ठेका दिलवाना हो या फिर किसी को ठोक पीट कर ठीक कराना हो। 

आप लोग पुलिस को तो मुट्ठी में लेकर चलते है, जब चाहे जैसा चाहे मौका-ए-वारदात पर उनका खुल कर इश्तेमाल कर लेते है।

चाहे जैसा माहौल हो, चाहे आप जेल में हों या घर पर, आप लोगों की सेवा भाव आपके भरे पुरे खाते पीते शरीर में दिखता है। वोट करने वाली जनता पतली दुबली ही रहती है परन्तु आप लोगो की बलिष्ठ शरीर आपके सेहत का एक झलक पेश करता है। 

वैसे भी आप लोगो की वजह से ही तो जनता की छद्म सेवा की जाती है, वरना तो सारे सरकारी नौकर (माफ़ करियेगा नौकरी करने वालों को नौकर कह रहा हूँ) कर्मचारी निठ्ठले है, जिनके कानों पर जूं नही रेंगती। 

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आप ही लोगो की वजह से तो किसान खेत में फसल उगाता है वरना तो वो भूखे मर जाएगा। देश के एक बड़े मंत्री ने चुनावी प्रचार में कहा, "हम इस प्रदेश के किसानों की तकदीर बदल देंगे", उनके इस कथन पर एक किसान केवल यही कहना पसंद करेगा, "बेटा जिस विश्वविद्यालय से जिस समय तुमने राजनीति शुरू किया, वो क्षेत्र उस समय गन्ना उत्पाद में विश्व भर में प्रथम स्थान पर था। पर तुम तो बेटा प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने, देश के केंद्रीय मंत्री भी बन गए पर आज चीनी आयात कर रहे हो। तुमसे ना बेटा, कभी ना हो पाएगा। इसीलिए बेटा हम कह रहे है तुम अपने बेटे का तकदीर केवल बदलो और उसको राजनीति में स्थापित करवाओ-खिलाओ बाकि हमारी तकदीर क्या घंटा बदलोगे? तुम्हारी औकात नही है| एक बात है देश के प्रहरी पर भरोसा है, जो देश की तरक्की में तार्किक ध्यान दे रहा है।"

आप लोग भविष्य को ध्यान में रखते हुए अपने परिवार के सात पीढ़ियो के खर्च के लिए कमाई कुछ सालों में कर जाते हो और देश को उसी हालात में रहने को मजबूर करते हो| अगर साफ़ शब्दो में बोला जाये, तो यही कि तुम लोग अपनी सोच बढ़ा कर राष्ट्रहित में काम भी करो कब तक एक ही बंदा सोचेगा और एक्शन लेगा।

शेष फिर....... 
पत्र: ६
राजेश्वर सिंह (#rajeshwarsh) 
गोरखपुर, भारत

Wednesday, January 18, 2017

पत्र: ५ (१८ जनवरी २०१७)

पत्र: ५ (१८ जनवरी २०१७)
पत्र उनके लिए जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारतीय जनता पार्टी के समर्थक है! 


प्रिय भाजपा समर्थको, 
नमस्कार! 
आशा है आप सभी सकुशल होंगे, और आगामी विधान-सभा चुनावों के लिए तैयार होंगे। कहते है कि सारे देश की मनोदशा उत्तर प्रदेश से होकर जाती है। और सभी राष्ट्रीय दल अपने चुनावी दाव-पेंच लगाने में जुटे हुए है। 

अभी अभी ताजा खबर मिला कि माननीय श्री एन डी तिवारी अपने जैविक पुत्र रोहित शेखर के साथ भाजपा में शामिल हो गए। वही तिवारी जी जिनकी उम्र आज लगभग इक्यानवे साल हो चुकी है और जिन्होंने एक युवा को तब अपना पुत्र माना जब सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया वो भी डीएनए टेस्ट करवा कर। खैर मैं क्या कहूँ राजनीति से मेरा प्रत्यक्ष या परोक्ष कुछ भी लेना देना नही है परन्तु जब देश एक तेज गति से विकासशील से विकसित राष्ट्र की तरफ बढ़ रहा है, ऐसे समय युवाओं को ना मौका देकर ऐसे निर्लज्ज (माफ़ करियेगा इस शब्द के लिए) को राष्ट्रीय दल में शामिल करना शोचनीय है। वैसे भी जब प्रधानमंत्री श्री मोदी जी अपने भाषणों में कुशल वक्ता के तौर पर युवाओं को मौका और एक उच्चीकृत मानसिकता से राष्ट्रहित में काम करने की बात करते है। 

जब आपके दल में ही ऐसे वृद्ध और अवगुण से परिपूर्ण (अपने पुत्र को पुत्र ना मानना, परमहिलाओं से यौन सम्बन्ध, राजभवन में यौन संतुष्टि के लिए कई महिलाओं से अंतरंग सम्बंध) राष्ट्र नेता सम्मिलित होंगे तो फिर इस देश का क्या हाल होगा? महिला सशक्तिकरण, युवाओं का साथ, नवाचार, दूर की सोचने की बात करते है ऐसे समय में ९१ साल के वयोवृद्ध ठरकी (जो ८८ साल की उम्र में शादी करता है, वो भी सर्वोच्च न्यायालय से फजीहत होने के बाद) को दल में शामिल करके कौन सा राष्ट्रहित में काम कर रहे है? 

आख़िरकार तिवारी परिवार के साथ साथ बहुगुणा जोशी परिवार, खंडूरी परिवार, आर्य परिवार के सगे-सम्बंधियों को चुनाव में उम्मीदवार बनाकर परिवारवाद की कौन सी परिभाषा बन रही है? क्या एक दल की चोली या धोती उतारकर दुसरे की पहनने से एक नपुंसक, पुरुष या महिला में परिवर्तित हो जाता है? और उसकी सोच बदल जाती है? 

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मेरे जैसे कइयों के दिमाग में ये प्रश्न कौंध रहा होगा, आखिर कौन से मामले में भाजपा दल कांग्रेस, सपा, बसपा, द्रमुक आदि दलों से अलग है? कब तक वही पुराने गणित पर गिनती करेगा? कुछ तो नवाचार की सम्भावना बनाओ। 

तब तो सबको एक और मौका मिलना चाहिए, ललित मोदी, विजय माल्या, सुब्रतो सहारा, आसाराम, अमरमणि, अमनमणि इत्यादि को भी.................... 

एक कटाक्ष: डब्लूएचओ (वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन) को एचआईवी/एड्स से होने वाले बीमारी में तिवारी कथा को शामिल कर लेना चाहिए, कि अंजान पुरुष/महिला से असुरक्षित यौन सम्बन्ध बनाने पर आपका एक औलाद भी हो सकता है जो डीएनए टेस्ट से आपके कमाई से हिस्सा ले लेगा। 

शेष फिर....... 
पत्र: ४ 
राजेश्वर सिंह (#rajeshwarsh) 
नई दिल्ली, भारत 

Wednesday, January 4, 2017

पत्र: ४ (४ जनवरी २०१७)

पत्र: ४ (४ जनवरी २०१७)

पत्र उत्तर प्रदेश के मतदाताओ के साथ साथ, प्रधानमंत्री जी, चुनाव आयोग और चुनाव विश्लेषकों को, 

प्रिय भारतवासियों, 
प्रणाम!
आशा है आप सभी सकुशल है और देश के विकास में अपना योगदान, अपनी कोशिश कर ही रहे होंगे। 
आज ही चुनाव आयोग ने देश के कुछ प्रदेशो के विधान सभा चुनाव के लिए तिथि तय किया है, जब चुनाव के चरणों और तिथियों पर नजर पड़ी तो सोचने पर मजबूर कर दिया। उत्तर प्रदेश बहुसंख्य जनमानस का प्रदेश है। हर जगह के जैसे यहाँ भी चुनाव को एक त्यौहार जैसे माना जाता है। अखबारों में कुछ और नही पढ़ने को होता तो, टीवी पर चुनाव समाचार और उनसे जुड़ी जानकारी के अलावा कुछ और नही दिखता। सब इसी त्यौहार में मदमस्त हुए होते है। 
आम चुनाव २०१४, ७ अप्रैल २०१४ से १२ मई २०१४ तक नौ चरणों में पूरा किया गया, इन चरणों को पूरा करने में ३६ दिन लगे, जबकि उत्तर प्रदेश का विधान सभा चुनाव ७ चरणों में पूरा होगा जिसमे २८ दिन लगेंगे।
इसके पहले के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव २६ दिन (२०१२) और ३२ दिन (२००७) में पूरा किया गया था। 

इतने दिनों के लिए प्रदेश स्तर, जिला स्तर, गांव स्तर के सरकारी महकमा परियोजनाओं को छोड़, चुनाव में व्यस्त रहता है।  क्या हम सही में उन्नति कर रहे हैं? तकनीकी में आगे बढ़ने के साथ क्या हम उन तकनीक का प्रयोग और संवर्धन आम जनमानस से ऐसे मौके पर नही कर सकते? आखिर कब तक समय और पैसे का दुरूपयोग होते रहेगा?
मेरे अनुसार ग्राम पंचायत, नगर पंचायत, विधान सभा, विधान परिषद् और लोक सभा चुनाव सब एक साथ होने चाहिए वो भी इलेक्ट्रॉनिक मतदान की सहूलियत के साथ, आज कैशलेस के साथ इसकी भी जरुरत है। 

शेष फिर........ 

पत्र: ४ 
राजेश्वर सिंह (#rajeshwarsh)
नई दिल्ली, भारत

Sunday, December 25, 2016

पत्र: ३ (२५ दिसंबर २०१६)

पत्र: ३ (२५ दिसंबर २०१६)


पत्र टीवीऍफ़ के संस्थापक अरूणभ कुमार के नाम!

नमस्कार अरुणभ!
जब आप अपने सपनों को जीने के लिए, एक उड़ान भरने के लिए धीरे धीरे पग को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे होते है तो, आप अपने अपने क्षेत्रो में सिद्ध महापुरुषों के बारे में पढ़ते है या फिर जानने की कोशिश कर रहे होते है। उनमे से कई महापुरुष गृहीत शिक्षा के इतर जाकर समाज के लिए एक नए दशा-दिशा का स्थापना कर रहे होते है या कर चुके होते है।

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 विद्वजन, विचारक, समाज सुधारक, अधिनायक सब अपने विशिष्ट गुण के कारण इतिहास के लिए एक नया अध्याय बनाते है, जिनसे आने वाली पीढ़ी सीखती है और समाज को आगे बढ़ाने के लिए अपना उत्कृष्ट देती है। टीवीऍफ़ के संस्थापक श्री अरुणभ कुमार (The Qutiyapa Guy) जी आप भारतवर्ष के प्रगतिशील युवाओं के लिए आदर्श बन चुके है। आपके समूह का मनोरंजन क्षेत्र में बहुआयामी कृत्य गुणवत्ता, विशेषता के आधार पर उत्कृष्ट और उत्तम होते है। टीवीऍफ़ के प्रणेता समूह में अधिकांशतः देश के नामी तकनीकी संस्थानों से उपाधिधारक है, शायद इसलिए उच्च कोटि का गुणवत्ता रखकर इस प्रवाह को उत्कृष्ट बनाए हुए है।

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टीवीऍफ़ का टैग लाइन है, "टीवी मर चुका है, हमारे कहानियाँ नहीं", जो आपके संस्था के बारे में बहुत कुछ बोलता है। आपके कुछ उवाचों में हमने आपके संघर्ष की कहानी सुनी है। आपने पिछले कुछ सालों में कई उत्कृष्ट वीडियो श्रृंखला बना दिए, जो समय सीमा के मामले में बॉलीवुड कथा चित्रो (Feature Films) के अनुरूप होंगे परन्तु गुणवत्ता में उनसे बेहतर है। टीवीऍफ़ द्वारा व्यक्त, उत्पादित श्रृंखला जैसे- परमानेंट रूममेट्स, पिचर्स, ट्रिपलिंग, बेयर्ली स्पीकिंग विथ अर्नब, चाय सुट्टा क्रोनिकल, दारू पे चर्चा, टेक कन्वर्सेशन विथ डैड, ह्यूमरोसली योर्स इत्यादि सारे प्रकरण में युवा कहीं ना कहीं खुद को जोड़ लेता है। संस्थापको का तकनीकी संस्थान उपाधिधारक होने के कारण इनके शुरू के वीडियो श्रृंखला अभियांत्रिकी, तकनीकी और प्रबंधन संस्थान के पुरातन छात्रों के लिए अपने महाविद्यालय की यादगार वीडियो जैसे लगती है, जो उनके स्मृतिपटल कुछ संकुचन के साथ साथ आनंद का अनुभूति कराती है।

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परन्तु 'टीवीऍफ़' के मूल वीडियो श्रृंखला (Original Video Series) 'परमानेंट रूममेट्स' में 'तान्या' और 'मिकेश' के गैर-पारंपरिक रिश्ते में सब कुछ है, जिसमे मानवीय भावनाओं को बहुत करीने से उलझते, सुलझते, मिलते, बिछुड़ते, रोते, हँसाते दिखाया गया है।

"पिचर्स" में 'नवीन', 'योगेंद्र', 'जितेंद्र' और 'सौरभ' के हिम्मत को दिखाया गया है, जिसमे चार नव साहसी, उद्यमी बनने के लिए कई कष्टों को झेलते, जूझते हुए आगे बढ़ते है। ये श्रृंखला हमारे लिए एक चुटकी (Pinch) जैसे है।

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"ट्रिपलिंग" में 'चन्दन', 'चंचल' और 'चितवन' एक जैसे परवरिश से होकर भी तीन तरह के अलग-अलग दिक्कतों में एक दूसरे के करीब आते है। तीन भाई बहनों के जीवन में आए उतार चढ़ाव के साथ एक सफ़र को अप्रतिम तरीके से प्रस्तुत किया गया है।

आजकल प्रसारित हो रहे 'ह्यूमरोसली योर्स' प्रकरण जिसमे एक व्यक्ति 'विपुल' के सामने आने वाले कठिनाइयों और समाधान के साथ साथ 'काव्या' के साथ प्रेम प्रलाप, टीवीऍफ़ समूह के गुणवत्ता और परिश्रमी होने का सबूत देता है।

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आशा है ऐसे ही उच्च कोटि के संग्रह देखने के साथ साथ विज्ञान परिकल्पना (Science Fiction) आधारित वीडियो भी देखने को मिलेगा।

धन्यवाद अरुणभ!
शेष फिर........

पत्र: ३
राजेश्वर सिंह (#rajeshwarsh)
नई दिल्ली, भारत

Friday, November 11, 2016

पत्र: २ (११ नवम्बर २०१६)

पत्र: २ (११ नवम्बर २०१६)
पत्र दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविंद केजरीवाल के नाम,
महोदय,
आशा और जैसा कि ट्विटबाजी और आपके वीडियो से लग रहा है आप सकुशल है। खैर वैसे भी जबसे मोदी जी ने अचानक से ५०० और १००० रूपये के नोट बैन किया  आपके चेहरे पर हवाईयाँ उड़ गई थी, तबियत तो ठीक है ना?
खैर यहाँ कुछ साल पहले आपके कृत्यों, वादों और चर्चाओ का बहुत बखान हुआ करते थे। 
सब के सब बोलते थे, क्या बंदा है यार! 
वहीं आज सभी बोलते हो क्या बंदा है यार?
खैर ये सब छोड़िये, ये बताइये आप अभियंता होकर, देश (देश तो आपके हाथ में नही) या  प्रदेश में तकनीक, अभियांत्रिकी, औद्योगिक या फिर जनमानस के जीवनशैली में कितने नवाचार पर काम किये है? अभियांत्रिकी का मूल उद्देश्य तो आप जानते ही होंगे। जनमानस की जीवनशैली सुधारने की बजाय आप अपने जीवन शैली को ही अग्रसर करने में लगे हुए हैं। 
पिछले महीने पड़ोसी देश पर हुए सर्जीकल स्ट्राइक पर भी आपके फेसबुक लाइव/ यूट्यूब वीडियो में आप उन लोगो के प्रश्नों प्रधानमंत्री महोदय के सामने उठा रहे है जो आपके अपने देश की विरोध करते है। 
कल के वीडियो में भी आप प्रधानमंत्री महोदय को कोस रहे थे, जैसे कि किसी ने आपकी रातों रात जेब काट ली हो, या आपकी तिज़ोरी लूट ली हो। आपकी भाषा भी इतने गिरे दर्जे की हो गई है कि क्या कहें! आप वोट के लिए इतने नीचे गिर जाएंगे, कभी सोचा भी ना था।
आपने बोला, कि देश की आम आदमी इसमें पिस रही है, कैसे आम आदमी पिस रही है?
देश की अधिकतर जनता अपने पैसे या तो बैंक में रखती है या फिर कहीं निवेश की होती है। घर में नोट रखना बहुत पुरानी बात है, वैसे भी आम जनता कभी लाखों रुपये नहीं रखती। वो गिने चुने काम भर के रुपये पास रखती है। 
आपने बोला, शादियों में लोग परेशान हो रहे है, पर आपने कभी सोचा है, दहेज़ का लेन-देन कितना होता है?
केटरर्स, टेंट वाले कैश में अगर काम करते है तो, उनकी कमाई भी दो-तीन लाख से ऊपर होती होगी, और वो आईटीआर भरते होंगे, फिर दिक्कत किस बात की?
अम्बानी, अडानी के बारे में बोला, बहुत अच्छे! पर कभी सोचा माल्या, ललित मोदी, कलमाड़ी, कनिमोझी और ए राजा नही बचे फिर तो ये भी फसेंगे ही किसी ना किसी रोज।
एक कहावत मशहूर है, 'लोग खुद जैसा होते है वैसा सोचते है'। कहीं फिर आप तो ऐसे नही?

मैं भारतीय राजनीति का पिछले दो दशकों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भुक्तभोगी रहा हूँ। किसान का लड़का हूँ, केंद्र सरकार और प्रादेशिक सरकार के लड़ाई में बहुत पिसे है, खेतों में खड़ी फसल कभी चीनी मिल बंद हो जाने से सूख गई तो कभी मौसम की मार से। बारिश ने फसलों को बहा दिया, तो कभी सूखे ने अनाज लगने ही नहीं दिया। मानवीय मजदूरी, पेट्रोलियम, खादों के दाम बढ़ा दी गई पर आज भी अनाजों के दाम अपेक्षा में कम है। आजादी के ६९ साल बाद आज भी गांव में मानवीय मूलभूत सुविधाओं से विमुख है पर मोदी सरकार की तरफ से कोशिश की तारीफ करनी होगी। आज ना सही, पर कल तो देश विकासशील से विकसित की श्रेणी में आ जाएगा। 
केंद्र सरकार को लिखे ईमेल का प्रति उत्तर मिल जाता है पर आपके सरकार और आपको लिखे ईमेल का कोई प्रतिउत्तर नही मिलता| अब इसे क्या कहें? आपको एक पत्र लिखा था ३ मई २०१६ को 'हैल्लो मुख्यमंत्री जी!' एक ट्रैफिक सिग्नल को दुरुस्त कराने के लिए फिर भी आप या आपके विभागों की तरफ से कोई समाधान नही। 

आप कभी खुद से ऊपर उठ कर देश को पहले रख कर नेतृत्व करो, फिर देखो देश कैसा हो जाता है। माननीय मुख्यमंत्री जी, केवल खुद के महत्वकांक्षा के लिए ऐसे व्यक्तव्य देकर युवाओं के मनोबल पर प्रतिघात ना करें। अगर फिर भी आप जैसे पढ़े लिखे मुख्यमंत्री का ये हाल है तो उल्लुओं जैसे नेताओ की जात ही कभी कभी अच्छी लगती है। 
वैसे देश की राजनीति में एक पप्पू तो है ही, अब एक गुड्डू की जरुरत थी, जो लगभग पूरी हुई लगती है।
शेष फिर.......
पत्र: २
राजेश्वर सिंह (#rajeshwarsh)
नई दिल्ली, भारत

Monday, November 7, 2016

पत्र: १ (७ नवम्बर २०१६)

पत्र: १ (७ नवम्बर २०१६)

पत्र प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह जी, रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभु, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश सिंह यादव और मुख्य निर्वाचन आयुक्त डॉ. नसीम जैदी के नाम, 

महोदयों,
आशा है आप सभी सकुशल होंगे, मैं २७ साल का एक भारतीय नागरिक हूँ। जिसका बचपन एक गाँव में, पढ़ाई शहर में हुई है, रोजी रोटी के लिए नौकरी मेट्रो शहर में करते हुए अब अपने कृतियों और नवाचार को एक प्रारूप देने में लगा है। यह एक पत्र के साथ साथ आप बीती है जिसे मैं बयाँ कर रहा हूँ। अगर समय ना हो तो सीधे नीचे के दो पैराग्राफ पढ़ लीजिये, जिसमे मैंने सुझाव देने की कोशिश की है, कि आपका वक़्त बच सके और मेरी बात आप तक पहुँच सके। और अगर मन करें तो आगे के पैराग्राफ पढ़िएगा, और मेरे वास्तुस्थिति को समझिएगा।
मेरे पैदा होने से एक साल पहले ही देश में मताधिकार का प्रयोग करने की आयुसीमा घटाई गई थी, और जब मैं पैदा हुआ तो देश के राजनीतिक गलियारे में बहुत चहल पहल हो रही थी। देश के प्रधानमंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोपो का अम्बार था, बचपन से लेकर आज तक देश, प्रदेश, गाँव हर जगह राजनीति का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभाव पड़ा है। इवीऍम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के प्रयोग से देश के चुनाव नीति और तौर तरीके में बहुत बदलाव हुए, फिर भी वोट डालने की प्रतिशतता में बढ़ोत्तरी के लिए अभी बहुत परिवर्तन की जरुरत है। 
मैं दिल्ली में रहता हूँ और अपने गाँव पर ही मताधिकार का प्रयोग करता हूँ। मैंने आजतक के सारे चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग मैं घर जाकर करता रहा हूँ, पर अब थोड़ी मुश्किल है क्योंकि,:
२०१४ के आम चुनाव में घर जाने के लिए तत्काल टिकट लिया पर वेटिंग के कारण टिकट कैंसल हो गया। फिर भी जैसे तैसे गया, आने के लिए 'सुविधा ट्रेन' में टिकट बुक किया था। सुविधा ट्रेन अभी नई नई शुरू हुई थी, और डायनामिक प्राइसिंग का कांसेप्ट रेलवे में शुरुआत हुआ था। खैर टिकट ले लिया, जिसमे कैंसल करने का भी कोई ऑप्शन नही था। गोरखपुर से दिल्ली आने के लिए मेरा और मेरे मित्र दो लोगो का टिकट था। परन्तु मेरे मित्र किसी कारणवश यात्रा नही कर रहे थे। सुविधा ट्रेन में ज़्यादा पैसा खर्च करके टिकट लेने के बाद भी जब मैं गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर अपने कोच में चढ़ने लगा, तो कोच पूरी तरह से भरी हुई थी,मेरा सीट पर जाने को तो छोड़ो, ट्रेन में चढ़ना मुश्किल हो रहा था। साथ में सामान काम था, इसलिए जैसे तैसे धक्का मुक्की करके ट्रेन में चढ़ा और सीट तक पहुँचा। पुरे ट्रेन राजकीय पुलिस से खचाखच भरी हुई थी, मेरे अलॉटेड सीट पर पहले से ही पुलिस के बंदे बैठे हुए थे, जिनसे थोड़ा सा एडजस्ट करने को बोलने पर वो अपने वर्दी का धौस दिखाने लगे। उनको बोलने पर कि मेरे पास दो सीट के लिए टिकट है, एक सीट पर बैठे पुलिस वाले ने गाली गलौज देनी शुरू कर दी। बहुत ही दयनीय स्थिति थी, पुलिस के बन्दे हर जगह पड़े हुए थे, सारे सीट पर, कम्पार्टमेंट में चलने वाले जगह पर भी कुछ पुलिस के लोग लेटे हुए थे। रास्ते में बस्ती स्टेशन पर तो गेट ही नही खोलने दिए कि ट्रेन में कोई और यात्री ना चढ़ सके। कोच के हर कॉम्पार्टेन्ट में एक दो सवारी और १०-१२ पुलिस वाले या तो लेटे पड़े थे या फिर बैठे थे, लखनऊ पहुँचने तक मैं सामान अपने पीठ पर लादे सीट के पास खड़ा रहा। लखनऊ में पहुँचते ही ट्रेन से कुछ पुलिस वालों के उतरते थोड़ी जगह बनी तो एक पुलिस वाले ने बैठने को जगह दिया। 
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वैसे भी उत्तर प्रदेश के पुलिस वालों के साथ ८० प्रतिशत नकारात्मक प्रभाव दिखा है, जबकि राजधानी दिल्ली के पुलिस वालों का ९० प्रतिशत प्रभाव सकारात्मक रहा है। 
इस बार फरवरी में होने वाले प्रादेशिक चुनाव में भी वोट देने जाना चाहता हूँ कि सेवाएं और सुविधाओं में थोड़ी तरक्की हो, ना कि फिर से गाली सुनूँ, फिर से परेशान होऊं, देश बदले, सोच बदले.......

प्रधानमंत्री कार्यालय, रेलवे मंत्रालय, गृह मंत्रालय, निर्वाचन आयोग और उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री कार्यालय के कर्ता-धर्ता इन बिंदुओं पर ध्यान दीजियेगा:-
  • चुनाव की तिथि चार महीने पहले घोषित किया जाए कि अधिकाधिक नागरिक अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें, जब तक कि किसी इलेक्ट्रॉनिक मत (वोट) का प्रारूप ना आ जाए, क्योंकि अग्रिम रेल टिकेट लेने की समय सीमा चार महीने (१२० दिन) हैं। 
  • अतिरिक्त ट्रेन चलाई जाए, मेट्रो शहरो से क्षेत्र के आस पास, चुनाव तिथि के नजदीक, कि मतदाता सुविधानुसार समय पर पहुँच सके और मताधिकार का प्रयोग कर सके।  
  • चुनाव में ड्यूटी पर लगे राजकीय पुलिस, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को बस की बजाय रेल सुविधा दिया जाए कि वो अपने घर या स्थानीय ड्यूटी पर जल्दी पहुँच सके। क्योंकि इनके भयावह स्वरुप को झेलना या यूँ कहें समझ पाना बहुत मुश्किल है। क्योंकि क्या है ना, इस देश में खाकी और खादी के सफ़ेद कपड़ो में बस दिखने को सादगी है। 
  • इलेक्ट्रॉनिक वोट का कांसेप्ट जल्दी से लागू किया जाए कि मत प्रतिशत में बढ़ोत्तरी हो। 
शेष फिर....... 

पत्र: १ 
राजेश्वर सिंह (#rajeshwarsh)
नई दिल्ली, भारत 


Wednesday, November 2, 2016

सच्चाई साझा करें झूठ नही!

मैंने जैसे ही फेसबुक अकाउंट खोला, एक मित्र द्वारा साझा किया 'फास्टेस्ट लेडी बैंकर" का पोस्ट दिखा। पोस्ट में बैंक के केबिन में एक महिला दिख रही थी, जिनके हाथ में कुछ नोट थे। जिज्ञासावश मैंने भी उस पोस्ट पर क्लिक किया, यूट्यूब पर एक वीडियो खुला, जिस वीडियो में एक महिला कैशियर कुछ रुपयों के नोटों को एक एक करके कॉउंटर मशीन में डाल रही थीं। उन महिला के काम करने की गति बहुत धीमी थी। 

मुझे उनके काम करने की गति में थोड़ी असहजता लगी, तो मैंने सोचा की गूगल बाबा से पूछ लेते है क्या सच्चाई है, जैसे ही मैंने फास्टेस्ट लेडी बैंकर लिखकर सर्च बटन दबाया, मुझे कई सारे लिंक मिलने लगे पर कोई भी ऐसा नही था जिस पर सच्चाई मानी जा सके। फिर न्यूज़ टैब पर देखा तो कई सारे विश्वसनीय लिंक मिले, जिनमे कुछ समाचार संस्था भी थे।

वहाँ पता चला "महिला श्रीमती प्रेमलता शिंदे,"महाराष्ट्र बैंक" में खजांची हैं और दो दिल के दौरे और एक पक्षाघात स्ट्रोक झेलकर भी बच गई हैं। शिंदे अगले साल फरवरी में सेवानिवृत्त हो रहीं हैं और पर्याप्त पूर्ण वेतन के साथ सेवानिवृत्ति तक घर पर बैठने के लिए उनके पास छुट्टियाँ जमा है, फिर भी उन्होंने एक सम्मानजनक तरीके से अपनी सेवा समाप्त करने के लिए चुना है। उसकी इच्छाओं को पूरा करने के लिए, उनकी शाखा ने उनके लिए एक अतिरिक्त कैश काउंटर की स्थापना की, इन सबके अलावा, शिंदे जी के पति का निधन हो गया है और उनका बेटा विदेश में रहता है खुद के लिए काम कर रहीं है।"

सरकारी संस्थानों में कभी कभी कुछ ऐसे धीमी गति से काम करते हुए कर्मचारी मिल जाते है। मगर कभी जान बूझकर धीमी गति से काम करने वाले नही मिलते। जिन महाशय व्यक्ति ने ये वीडियो साझा किया, उन्होंने सोचा होगा कि इससे वो देश में एक बदलाव ला रहे हैं। साझा करने वाले भी यही सोचकर साझा किये होंगे कि जो पोस्ट है वो वाकई ठीक है और उनको साझा करके वो देश के तरक्की में अपना कोरम पूरा कर दिए। गलतियों को साझा करना सही है परंतु उसके पीछे का कारण पता करने के बाद।

कुछ वक़्त पहले एक और वीडियो ट्रेंड में आया था, जिसमे एक दिल्ली के पुलिस "सलीम" जी को मेट्रो में गिरते हुए दिखाया गया था। दिल्ली पुलिस से उन्हें निष्कासित भी कर दिया गया परंतु चिकित्सीय जाँच में पाया गया की उन्हें पक्षाघात स्ट्रोक हुआ था, जिसकी वजह से वो दिल्ली मेट्रो में गिर पड़े थे। फिर उनकी बहाली हुई।

आजकल समस्याओं को महान हस्तियों से जोड़कर कुछ अफवाहें फैलाई जा रही हैं, जिनमे से एक का उदाहरण मैं दे रहा हूँ, जिसे लगभग आठ-नौ मित्रो को समझा चुका हूँ। मैसेज/मेल/पोस्ट होता है पार्टी में बचे भोजन को गरीबों में बाँटने के लिए १०९८ (1098) पर कॉल करें और संस्था आपके घर से भोजन ले जाकर गरीब बच्चों में बाँट देगी। इस अफ़वाह के चलते चाइल्डलाइन इंडिया फाउंडेशन को कई फ़ोन कॉल मिलते है, जिनमे बताया जाता है कि "हमारे यहाँ पार्टी हुआ है, कुछ खाना बचा है आप ले जाइये"। चाइल्डलाइन इंडिया फाउंडेशन (सीआईएफ) महिलाओं के संघ एवं बाल विकास मंत्रालय की नोडल एजेंसी है, जो देश भर में चाइल्डलाइन 1098 सेवा की स्थापना, प्रबंधन और निगरानी के लिए बुनियादी संगठन है। जो बाल संरक्षण के मुद्दे जैसे, "दुर्व्यवहार और हिंसा, तस्करी, बाल श्रम, कानून के साथ संघर्ष, बाल विवाह, बाल यौन शोषण, माता पिता की देखभाल के बिना गली के बच्चे, जन्म पंजीकरण, सशस्त्र संघर्ष, विकलांगता, दवाई का दुरूपयोग, बच्चियों, एचआईवी-एड्स संक्रमित बच्चे, ग़ुम बच्चे इत्यादि" का समन्वयन करती है। 

ना जाने कितने ऐसे केस होते है, जिन्हें हम बेवजह ही इतना बढ़ावा दे देते है कि उस इंसान या संस्था को परेशानी और शख्सियत के साथ साथ देश के भी साख को नुक्सान होता है। 

वीडियो या पोस्ट को ट्रेंड में लाने के लिए एक व्यंगात्मक/टिप्पणीनात्मक शीर्षक देखकर साझा ना करें। चंद पसंद और टिप्पणी के लिए कुछ भी प्रकाशित करने से पहले उसके सत्यता की जाँच कर लें। 

आजकल कुछ फ़र्ज़ी समाचार संस्थाये भी ऐसे लेख, फोटो और वीडियो को पोस्ट कर लोगो को दिग्भ्रमित कर रहीं है, इसलिए सजग रहिये, सचेत रहिये और देश की तरक्की में सहयोग करते रहिये। 


जय हिन्द! 


राजेश्वर सिंह
#rajeshwarsh
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Friday, September 16, 2016

पल भर का प्यार‬: १०

#‎पल_भर_का_प्यार‬: १०

राज और अनुज काफी अच्छे मित्र थे, कॉलेज के चार सालों में दोनों ने अधिकतर वक़्त साथ बिताए थे। अनुज का घर बक्सीपुर में था तो राज सिंघड़िया में किराए के मकान में रहता था। अनुज कंप्यूटर साइंस (सीएस) विषय से इंजीनियरिंग की पढाई कर रहा था तो राज इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी (आईटी) में महारथ हासिल करने में लगा हुआ था। क्योंकि दोनों विभागों के विषयों में ज्यादा अंतर नहीं होता, इसलिए दोनों को पढाई में कोई दिक्कत भी नहीं होती। दोनों की छुट्टियाँ अक्सर साथ बीतती थी। कभी अनुज राज के कमरे पर आता तो कभी राज अनुज के घर पर पर डेरा डाले रहता। परन्तु परीक्षा के दिनों में अनुज हमेशा राज के कमरे पर पड़ा रहता था।  पौने चार साल की दोस्ती में दोनों इतने करीब हो गए थे, कि  दोनों को किसी और की फिक्र नहीं रहती, एग्जाम के दिनों में तो पढ़ लेते पर बाकि दिनों में घूमना, फिरना, गेम खेलना, मूवी देखना होता था। 

कॉलेज के अंतिम दिन चल रहे थे, एग्जाम ख़त्म हो चुके थे पर प्रैक्टिकल वाईवा नहीं हुआ था। वाईवा का डेट भी आ चूका था। मई महीने के गर्म भरे मौसम की खड़ी दुपहरी में, राज के कमरे में अनुज और राज दोनों लैपटॉप पर २४ (टवेंटी फोर) सीरियल देख रहे थे। कमरे में कूलर की हवा हनहनाते हुए चल रही थी, कुछ ही समय पहले दोनों ने नाश्ता किया था। तभी राज का मोबाइल घनघनाने लगा। चूँकि स्पीकर पर वॉल्यूम लेवल अपने चरम पर था, इसलिए मोबाइल का आवाज दोनों में से कोई नहीं सुन सका। सीरियल ख़त्म होने के बाद राज की नजर अपने मोबाइल पर पड़ी, देखा तो अंकिता के नंबर से मिस्ड कॉल था। 


कॉलेज के दिन ख़त्म होने के कारण, नौकरी के लिए सब हाथ पैर मार रहे थे। कॉलेज ने तो प्लेसमेंट नहीं कराया इसलिए नौकरी पाने के लिए दोनों, वो सब कुछ ट्राई करते, जिससे उनको नौकरी मिल जाये। नौकरी के लिए दूसरे शहरों में होने वाले वाकिंग में राज और अनुज दोनों साथ जाते, सरकारी नौकरियों के लिए भी दोनों साथ में आवेदन करते। अधिकतर प्रतियोगी परीक्षाओं और वाकिंग में अंकिता भी राज के साथ ही जाती।
"भाई तुमको मेरे फ़ोन का रिंगटोन नहीं सुनाई दिया था क्या?", राज अनुज से पूछा, "नहीं तो", अनुज ने अपना सिर ना में हिलाते हुए उत्तर दिया।
"यार अंकिता की कॉल आई थी", अनुज बोला और अपने मोबाइल से अंकिता को कॉल करने लगा। 
अंकिता राज की क्लासमेट थी, और दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे। दोनों अक्सर एक दूसरे का हाल चाल जानने के लिए फ़ोन करते, लम्बी बातें करते रहते थे। 
अंकिता से बात करते हुए पता चला कि आने वाले रविवार को एक सरकारी संस्था में नौकरी के लिए लिखित परीक्षा है, जिसका एडमिट कार्ड मेल पर आ चूका है, अंकिता से बात करते हुए राज ने अनुज को बोला, "भाई, अपना एडमिट कार्ड चेक करना सेंटर कहाँ है?" 
इधर अनुज लैपटॉप में एडमिट कार्ड चेक करने लगा और राज अंकिता से बातें करते हुए कमरे में ही टहलने लगा। कुछ मिनटों के बाद अनुज बोला, "यार, अपना परीक्षा केंद्र तो लखनऊ में हैं।"
 जैसे ही राज ने अंकिता को ये बात बताई, अंकिता ने राज को अपने साथ में ही रेलवे टिकट बुक करने को बोल दिया। अनुज को शनिवार का टिकट बुक करने को बोलकर राज अंकिता से बातें करते रहा। 
कुछ मिनटो के बाद जब राज और अंकिता की बात-चीत ख़त्म हुई, अनुज ने बताया कि शनिवार शाम का टिकट हो गया है। 
"ठीक है", राज ने बोला और दोनों फिर से टवेंटी फोर सीरियल देखने में व्यस्त हो गए। 
वाईवा भी ख़त्म हो चुके थे। शनिवार का दिन आ गया, पुर्नियोजित समयानुसार शाम को तीनो दोस्त गोरखपुर प्लेटफार्म नंबर १ पर मिले। राज अकेले आया था, जबकि अनुज के साथ उसके पिताजी और अंकिता के साथ उसके चाचाजी थे। राज, अनुज और अंकिता तीनो के सीट एक ही कूपे (कम्पार्टमेंट) में थी। ट्रेन का समय हो गया, तीनो ने सबसे आशीर्वाद लिया और ट्रेन में जा बैठे। ट्रेन चलने लगी, सबने हाथ हिलाकर टाटा बॉय किया।  

अनुज अपने शर्मीले स्वाभाव के कारण किसी से बातचीत शुरुआत करने से कतराता था। परन्तु उसे सामरिक, राजनीतिक, विज्ञान, अविष्कार, प्रौद्योगिकी, रक्षा मामलों में वाद-विवाद करना अच्छा लगता था। उसे इन विषयों पर वाद-विवाद करके कोई हरा दे, ऐसा मुमकिन ना था। इससे पहले कभी भी अंकिता और अनुज का मुलाकात कॉलेज में कई  बार हुआ था परन्तु आमने-सामने ऐसे कभी नहीं बैठे थे। राज अपने वाकपटुता से किसी भी विषय पर चर्चा करने लग जाता। राज और अंकिता बाते करने में मशगूल हो गए और अनुज अपने साथ चेतन भगत की किताब "रेवोलुशन २०-२०" में व्यस्त हो गया। अनुज और अंकिता दोनों की आपस में बातचीत ना के बराबर ही थी, राज को रहना उचित नहीं लग रहा था और उसने बात करते करते "भारतीय सरकार द्वारा चीन निर्मित सेलुलर प्रौद्योगिकी यंत्रों का भारत में प्रतिबंध" टॉपिक पर चर्चा करना शुरू कर दिया। देखते ही देखते कूपे में बाकि के तीन सीटों पर बैठे विद्वजन गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, बहुराष्ट्रीय कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर और एक सरकारी कंपनी में एचआर थी जो इस चर्चा में शामिल हो गए। राज, अंकिता और विद्वजन के चर्चा में अनुज चुप रह जाए ये मुश्किल था, अनुज भी अपनी बाते स्पष्ट तथ्यों के साथ वाद विवाद करने लगा। 
जहाँ अंकिता और बाकि विद्वजन भारतीय सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को अनुचित ठहरा रहे थे वहीं राज और अनुज भारतीय सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को उचित बताने के लिए तरह तरह के आधारों, विवरणों, घटनाओं, समाचारों का जिक्र करने लगे। चर्चा काफी लम्बी खींचने लगी तो प्रोफ़ेसर जी ने अनुज, राज और अंकिता तीनो के तर्कों, विश्लेषणों, आधारों का प्रशंसा करते हुए बोले, "रात काफी हो चुकी है, और आपने बहुत अच्छा परिचर्चा किया, मुझे काफी अच्छा लगा कि आप लोग, ऐसे विषयों पर भी चर्चा कर रहे हो" और अनुज के मुखातिब होकर बोले, "अगर आपके पास वक़्त हो तो मेरे ऑफिस में आकर मिलिए"। 
राज और अंकिता प्रोफ़ेसर जी के तरफ देखने लगे तो वो फिर से बोले,"आप लोग भी आ सकते है", तीनो दोस्तों के समझ में कुछ नहीं आ रहा था और एक प्रश्न के भाव लेकर प्रोफ़ेसर जी को एकटकी लगाए देख रहे थे, कुछ देर बाद प्रोफेसर जी बोले, "दरअसल मुझे एक तकनीकी सहायक की जरुरत है, यदि रूचि हो तो शायद आप में से कोई मेरी सहायता कर सके"।
"सर कितने सहायकों की जरुरत है? दो तीन नहीं है क्या?" अंकिता ख़ुशी प्रकट करते हुए पूछी और फिर बताती गई, "सर तीन नहीं तो कम से कम हम में से दो को सहायक रख कर देखिये, आपको निराश नहीं करेंगे। अनुज को तो देख ही लिए आप उसके जैसा होनहार, तर्क-संगत, विद्वान् आपको नहीं मिलेगा, हम आपसे ज़रूर मिलेंगे, हम सोमवार सुबह गोरखपुर लौट जाएंगे, आपसे हम कब मिले?" 

"मैं कल ही लौट जाऊँगा, सोमवार को ही मिल लो...... पर तैयारी करके आना", प्रोफेसर जी ने बोला। 
"ठीक है सर, हम तीनो आपसे सोमवार को १० बजे सुबह मिलेंगे, आपके ऑफिस में " अंकिता कौतुहल में ही बोल दिया, बिना अनुज और राज से पूछे। 
अंकिता आँखे बड़ी करके मुस्कुराते हुए राज और अनुज की तरफ देख रही थी, जैसे बैठे बिठाये उनको नौकरी मिल गई। अनुज और राज दोनों और संजीदा हो गये। रात के दस बज चुके थे, तीनों ने मिलकर भोजन किया और अपने अपने सीट पर जाकर सो गए।  


भोर के ३ बजे तीनो लखनऊ पहुंच गए, स्टेशन से ऑटो लिया, लखनऊ एयरपोर्ट के पास तीनों को जाना था। ऑटो के एक तरफ राज बैठ गया और अंकिता को बीच में बैठने के लिए इशारा किया। अंकिता बीच में बैठ गई इसके बाद अनुज ऑटो में बैठा। एक तरफ राज था तो दूसरे तरफ अनुज था और बीच में बैठी अंकिता थी। ऑटो में ग़ज़ल गायकी के बादशाह जगजीत सिंह का गाया "ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो......" गीत बज रहा था, तीनो एक दूसरे को देखने लगे। 
अचानक राज ने कहा, "यार बचपन ही सही था, जो हम मौज में रहते थे, किसी चीज़ का फिक्र नही था", राज की बात सुनकर अंकिता और अनुज ने हाँ में सिर हिलाया, और ऑटो स्टेशन के पार्किंग से निकल  मुख्य मार्ग पर आ गई। राज की बातें सुनकर ऑटो वाला बोला, "भैया जिंदगी है ये, बढ़ती ही जाएगी, कोई रोक नही पायेगा", ऑटो वाले की बात सुनकर तीनो मुस्कुराने लगे। रेलवे स्टेशन से एयरपोर्ट जाने में लगभग आधे घंटे लगते है, ये सोचकर राज ऑटो में ही सो गया। अनुज और अंकिता चुपचाप बैठे गाने सुन रहे थे। 
अगला ग़ज़ल जगजीत सिंह जी के आवाज में था "झुकी झुकी सी नजर बेक़रार है कि नही, दबा दबा ही सही दिल में प्यार है कि नही. ... . . . . . . . . . ."
ऑटो वाला ऑटो को गति के साथ भगा रहा था, सड़क एकदम सुनसान थी, कभी कभार कुत्तों का भौंकना सुनाई देता था, वो भी पल भर में दूर चला जाता था। राज एक किनारे सोया हुआ था,ऑटो के अंदर घुप अँधेरे में अनुज और अंकिता ऑटो में चुपचाप गाने सुनने में व्यस्त थे। 
अनुज और अंकिता एकाध पल के लिए एक दूसरे को देख लेते थे, और आँखे मिलते ही मुस्कुरा देते थे। "तुम जो इतना मुस्कुरा रहें हो, क्या ग़म है जो छिपा रहे हो.... . . .. . . ." ग़ज़ल बज रहा था जब अचानक एक मोड़ पर ऑटो दाएं तरफ मुड़ा और राज अंकिता के ऊपर आ गिरा। राज के अंकिता के तरफ अचानक आने से, अंकिता अनुज के और करीब सरक गई। ये सब इतना अचानक हुआ कि किसी को कुछ पता ना चला। राज की नींद टूट चुकी थी और ऑटो वाले को डाँटते हुए बोला, "अरे भैया थोड़ा देखकर चलाइये"।
"ठीक है भैया", ऑटो वाले ने बोला और ऑटो को सड़क पर सरपट दौड़ाये रखा। 
सामने की तरफ से आने वाले इक्का दुक्का गाड़ियों के आवाजाही से कभी कभार ऑटो में रोशनी आ रही थी। इन्ही रौशनी में अनुज और अंकिता एक दूसरे को तिरछी नज़रो से देख रहे थे। कुछ समय बाद ऑटो में जगजीत सिंह जी की पत्नी चित्रा सिंह जी का गाया गीत "तू नही तो जिंदगी में और क्या रह जाएगा.........." बजने लगा। इन गीतों के तरत्नमय ने ऑटो में अनुज और अंकिता के दरम्यान एक शमां जला दी थी, जिससे राज और ऑटो चालक दोनों अनभिज्ञ थे। 
अनुज और अंकिता दोनों किसी द्विस्वपन में खो गए ऐसा प्रतीत हो रहा था, "भैया आगे से बाएं ले लो" राज ने ऑटो चालक को कहा तो अनुज और अंकिता की तन्द्रा टूटी। इतने में अंकिता के बुआ का घर आ गया और अंकिता को उसके बुआ के घर छोड़कर राज और अनुज अपने एक मित्र के घर चले गए। सुबह होने में अभी कुछ घंटे बाकि थे और परीक्षा नौ बजे से था।
राज बिस्तर पर पड़ते ही सो गया, पर अनुज की आँखों से नींद गायब हो थी। इधर अनुज का ये हाल था तो उधर अंकिता भी अपने बुआ के बिस्तर पर पड़े पड़े किसी सपने में खो चुकी थी। 

अंकिता और अनुज के परीक्षा केंद्र एक ही थे और राज का करीब के ही दूसरे विद्यालय में था।  
   

ये कहानी थोड़ी लंबी है इसलिए इसे कई भाग में लिखना पड़ेगा। 
पल भर का प्यार‬: १० का दूसरा पार्ट जल्दी ही लिखूँगा........ 

तब तक बाकि के पोस्ट पढ़ सकते है!